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सियासत की चाहत
मंज़िल का पता पूछते हैं?
तू कैसे मुझे भुलायेगा!
जिसने देखा ही नही, चाँद!
धूप में छाँव, है हमारा गांव
तुम्हारे पते पर भेजना है
जंज़ीर
थोड़ी उदास थी!
साथ धूप साये का.....
हर बात लिखूंगा
सरकार जनता ते रही है खेल।
शायद चुनाव आने से ठीक पहले....!
सौ दफ़े मरते हैं?
तुम्हारे शहर का मिज़ाज़ क्या है?
कोई सितम नही किया
तुम्हारे बाद क्या?
अच्छा सुनो यार! गुस्सा ख़तम
बिन पढ़े, छोड़ दिया गया हूँ !
लोग कुछ तो कहते होंगे....
मौत के साये