चुनाव आने से ठीक पहले....
तुम्हें चौराहों पर इकठ्ठा किया जायेगा
तुम्हें रैलियों में आने का निमंत्रण दिया जायेगा तुम्हें भीड़तंत्र में तब्दील करके रैलियों को सफल बताया जायेगा, जितने लोग होंगे उसी अनुपात रैली सफल , असफल मानी जायेगी। तुम्हें याद दिलाया जायेगा कि तुम्हारी भी लोकतंत्र में भागीदारी है।
यदि इसे बचाये रखना है तो में वोट करो, वोट करने के लिए मतदाताओं को प्रेरित करने की खातिर दीवारें, चौराहे, और सोशल मीडिया प्लेटफार्म सब जगहें स्लोगनों से भर दी जाएंगी। ये सब एक आम इंसान के लिए होगा, जो मेहनत मजदूरी करके अपना परिवार चलाता है।
उसे बताया जायेगा तुम भी लोकतंत्र में भागीदार हो। तुम्हारे कंधो पर ईमानदार सरकार चुनने की जिम्मेदारी है। पर उसे ये नही बताया जायेगा की सारे नेता एक ही थाली के चट्टे बट्टे हैं।
फ़िर सरकार बनाते समय उस आम इंसान की याद किसी भी पार्टी और नेता को नही आएगी जिसे चुनाव से ठीक पहले आम इंसान को एक ईमानदार मतदाता बनाने में दलों ने सारी ताकतें झोंक दी थी।
उस मतदाता की भावनाओं को दरकिनार करते हुऐजोड़तोड़ की राजनीती करते हुए पार्टियां सरकार बना लेंगी। उस आदमी का क्या होगा जिसने चुनाव से ठीक आदमी से वोटर बना दिया गया था?
वो क्या करे बेचारा! फिर से आम आदमी बन जाये या फ़िर किसी अगले चुनाव तक वोटर ही बना रहे! उसके लिए नीतियों का निर्माण कब होगा? शायद चुनाव आने से ठीक पहले....!

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