कितना अजीब है न, इंसान होकर भी
दिल के बारे में भी दिमाग से सोचते हैं!
जिन्हें ख़ुद के रास्तों का नहीं है पता
उनसे हम अपनी मंज़िल का पता पूछते हैं?
इसी बात पर हम पछतावा कर रहे हैं
खुद से बेखुद और खुदा के बारे में सोचते हैं!
किसी को शिकायत है तो सुन ले मेरी बात
एक निगाह में कई रूहों का चेहरा देखते हैं।
मौसम बदल गया, रूत भी न रही बीते ज़माने की
जिधर भी नजर उठती है सहरा ही सहरा देखते हैं।
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