सियासत की चाहत

एक चूल्हा जलता रहे, 

चाहे सौ चूल्हों पर पानी पड़े

सियासत चाहती है हिंदोस्ता की 

आदमी -आदमी से लड़ता रहे।



सरकार करती हैं जुल्म अवाम पर

इसलिए कि आदमी सरकार से डरता रहे

जो मर नहीं रहा है टीबी, मलेरिया से

वो आदमी मगर भूख से मरता रहे।



वोट देने के लिए लोकतंत्र है सबके लिए

फ़िर पांच साल भाड़ में जनता रहे

कोई मरे इलाज के अभाव में फर्क किसे

जो जहां है वहीं चुपचाप मरता रहे।


दंगा, फसाद में आवाम को झोंककर

नेता जो चाहे वो काम करता रहे

रैलियों में भीड़ बन जाओगे अगर तुम

नेता चाहता एकतरफा बयान वो करता रहे



लोकतंत्र को बेचते हैं औने पौने दाम पर

चीरहरण करते हैं, लोकलाज के नाम पर

भाषण देते हैं सांप्रदायिक नेता जी

और वोट मांगते हैं काम पर



सरकार चाहती है आदमी आंदोलन न करे

हक गंवाकर, बस जी हुजूरी करता रहे

आवाज़ कोई उठाए तो भांजते हैं लाठियां

आखिर कब तलक आदमी सरकार से डरता रहे?

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