इतनी कालिख़ लगी है चेहरे पर,
आईना हाथ में लेने से डरते हैं!
जो कहते थे सिर उठा के जियेंगे
देखों आज वही, सौ दफ़े मरते हैं?
इतनी ज़ोर से चीखतें हैं, इनकी
चीखों से, सोये हुआ बच्चें भी डरते हैं
नज़रों के सामने होती है हैवानियत
लोग देखते हैं, महज़ आह भरते हैं!
यहाँ ज़ख्म कुछ इस तरह निखरते हैं
हाथ के कँगन टूट कर बिखरते हैं
सबको देते हैं ये आसमाँ का वास्ता
मगर वादा करते ही चुपचाप निकलते हैं!
कट्टर कैसे भी हो नुकसान ही करते हैं
सबसे पहले जन मानस का विवेक हरते हैं
करने को काम नही है, लेकिन ये सब
इंसानियत को तोड़ने का काम करते हैं?

0 Comments