क़िताब का पन्ना हूँ, मोड़ दिया गया हूँ मैं
ऐसे ही बिन पढ़े, छोड़ दिया गया हूँ मैं
किसी की नज़र में मेरे हर्फ़ आये ही नही
ख़ुद टूटा हुआ हूँ या तोड़ दिया गया हूँ मैं
खंज़र रूह में उतारु , तुझसे दूर हो जाऊं
साँसे वफ़ा छोड़ दें, मजबूर हो गया हूँ मैं
बहार की छाँव में धूप सा जल गया हूँ
पत्थर होकर भी बर्फ़ सा पिघल गया हूँ मैं
रास्ता कोई देता ही नही है यहाँ पर लेकिन
ऐसा लगता है खुद से आगे निकल गया हूँ मैं
✍️ Trishi

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