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अब तौ महंगी होइगै दाल
सरकार उतारि करि मानी खाल
जबसे महिंगा भवा है तेल
सरकार जनता ते रही है खेल।
दुइपहियम ख़तम होइगवा तेल
लागति है हार्ट गलिम होइ जइ फेल
ज़िन्दगी होइगै झेलमझेल
सरकार जनता ते रही है खेल।
सब्सिडी पैंतीस रुपैया आई
बताओ कैसे गैस भराई
का हम फिरी चूल्हेंम रोटी बनाई
बताओ कैसे गैस भराई?
किसानौ क नही छोड़िन हैं
जिहिका पाईन उहिका निचोड़िन हैं
यूरिया के दाम ज्यादा वसुलिनी हैं
अउर तौ अउर डीएपी पर
एकौ रूपया नही छोड़िन हैं।
कम कय पर्ची काटि का
ज्यादा बड़ी नोट मोडिन हैं
सबहिन पर पड़ी है महंगाई की मार
जनता मानि लिहिस है हार
मुहि ते निकरत याकेय बात
राजनीती करौ तुम लेकिन,
जनता के साथ करौ न व्यापार।
अउरी चोटन से बड़ी है महंगाई की मार
न मनिहो, तो अबकी पक्का जइहो हारि
चुनाव खोपड़ी पर है, अब रक्खौ कदम सँभारि
सुधरि जाव, तुमरे नीके ख़ातिर बतलाईत
खुब जियु जारेव है, अब देखों आँखि फारि.

4 Comments
Wah! 😁👍👍
ReplyDeleteबहुत सही आपने जो कविता के माध्यम से महगायी और राजनीति के निम्न पहलुओं को उजागर करने की कोशिश की है वह बहुत ही सराहनीय है।
ReplyDeleteबहुत आभार
DeleteGood job.
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