गुज़रने को हर घड़ी चुपचाप गुज़र जाती है
मगर मेरे सामने क्यों तस्वीर उभर आती है!
हमने दफ़्न कर दी दिलों, दिमाग की तस्वीरें
मगर रोज़ सीने को चीरकर निकल आती हैं!
मैं बंधा नही हूँ, किसी के ख्यालों में, सुन लो
मुझे! हाथों में पड़ी जंज़ीर नज़र आती है!
तुम से अच्छी हैं समंदर की बलखाती लहरें
किनारों को किनारों से हर रोज़ मिलाती हैं !
देने को अब कोई किसी को सहारा नही देता
ग़ज़ब है राहें, मंज़िलों को विश्वास दिलाती हैं!

0 Comments