जिसने देखा ही नही, चाँद!

 हर रोज़ चाँद को तुम तकते हो

नज़रें उसपर क्यों रखते हो?

सज़दा उसका जायज़ है

जिसने देखा ही नही, चाँद!


अपना क्या, अपनी छत पर

रोज टहलता है आवारा चाँद

सज़दा उसका जायज़ है

जिसने देखा ही नही, चाँद!


तुम्हें यकीन है सदियों तक

तुम्हारा चाँद तुम पर साया करेगा

मेरी भी मान लो बात तुम

मुझे मालूम है इसकी फ़ितरत

कोई मिल गया तो, सबसे पहले,

तुम्हें पराया करेगा, तुम्हारा चाँद!


तुम्हारी नज़रों के सामने,

बेमौसम,

गैरों पर मोहब्बत बरसाया करेगा चाँद

तुम कहती हो तुम्हें छोड़ेगा नही

पराया नही करेगा, तुम्हारा चाँद!


सुन के हमारे मुंह से गैरों सी बातें

तुम्हें बुरा लगेगा, अंदर तक जल जाओगी

होंगे न एक दूसरे के कभी पूरब- पश्चिम

अभी पत्थर हो कभी मोम सी पिघल जाओगी।


ख़ुद आकार ले रही हो तुम खुद में

जैसा सोचोगी वैसे ही सांचे में ढल जाओगी

लोग बहुत मिलते हैं कहते हैं बदलेंगे नही

और हमें यकीन हैं बहुत जल्द तुम भी बदल जाओगी।











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