हुक़ूमत का ताज़, तुम्हारे क़दमों में गिरवी रहेगा
दिल -ए- दरबार में, कोई लाया नही जायेगा!
हम एक- दूसरे का भुला देंगें चेहरा, इस कदर
मगर अहसास- ए-दिल, मिटाया नही जायेगा!
अबसे धूप- साये का साथ जाया नही जायेगा
मगर हम दोनों से साथ निभाया नही जायेगा!
ग़मों की बात तो, बहुत दूर की बात है हमनवां
इन अंगुलियों से तेरा नंबर मिलाया नही जायेगा!
पहले से ज़ियादा आने लगी, ख्वाबों में वो मेरे
अब ये मुसाफ़िर रात को जगाया नही जायेगा!
गम ए उल्फ़त में इतनी सिसकियाँ आ गईं हैं
मालूम है, दिल को अब रुलाया नही जायेगा!
हमें खोना था जो, सरेराह खो दिया है, लेकिन
इबादत के सिवा, हमसे कुछ कराया नही जायेगा!

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