अश्कों की चोट से दीवाने,
क्यों घायल हुआ करते है ।
न जाने क्यों चोट खाकर भी,
वे मोहबत्त किया करते है।
शायद उन्हें मालूम न होगा,
मोहब्बत में अक्सर जुदाई मिला करती है।
ख़ुदा बनाते रहे जिनको जिंदंगी भर ,
वो पत्थर के सनम निकले।
सनम निकले वो पत्थर के,हमे ये भी मंजूर है,
मैं उनसे दूर वो मुझसे दूर है।
वो खुश रहे आबाद रहें उनका ये हसीं जहां,
संग उनके हमें बिताने को मिले जो वो पल कम कहां?
उनकी ये बेदर्दी, ये उनकी कातिल अदाएं
चोट न करके भी चोट करती।
सनम निकले वो पत्थर के , हमे ये भी मंजूर है,
मैं उनसे दूर, वो मुझसे दूर है।

2 Comments
अच्छा लिखा है त्रिशूल
ReplyDeleteधन्यवाद विकास भाई
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