लाखों की भीड़ है फिर भी तन्हाई है, शहर शहर है, फिर से गाँवों की याद आयी है।
गाँवों के देश को शहर बनाया जा रहा है, बनाना है गाँवों को शहर तो बेशक बनाओ।
पर आपस में बढ़ रही दूरियो को मिटाओ, गर हो सके तो संबंधों का शहर बचाओ।
लाखों की भीड़ है फिर भी तन्हाई है, शहर शहर है, फिर से गाँवों की याद आयी है।
शहर में बिजली, पानी,अस्पताल सरीखी उपलब्ध सुविधाएं है, उससे कही ज्यादा अकेलापन ढेर समस्याएं और दुविधाएं है।
सारा शहर देर रात तक जगता है, टेलीविजन, इंटरनेट,संगीत अकेलेपन को कुछ हद तक कम करता है।
सड़क चौड़ी कर रहे हो तो करो, पर कुछ ऐसा भी करो जिससे सड़क सिर्फ गाड़ियों से भरी न हो, आसमान वाहनो के धुएं की धुंध से काला न हो।
शहर में बिजली, पानी,अस्पताल सरीखी उपलब्ध सुविधाएं है, उससे कही ज्यादा अकेलापन ढेर समस्याएं और दुविधाएं है।
सारा शहर देर रात तक जगता है, टेलीविजन, इंटरनेट,संगीत अकेलेपन को कुछ हद तक कम करता है।
सड़क चौड़ी कर रहे हो तो करो, पर कुछ ऐसा भी करो जिससे सड़क सिर्फ गाड़ियों से भरी न हो, आसमान वाहनो के धुएं की धुंध से काला न हो।
शहर में बिजली, पानी,अस्पताल सरीखी उपलब्ध सुविधाएं है, उससे कही ज्यादा अकेलापन ढेर समस्याएं और दुविधाएं है।
शहर में आये कोई तो, भले ही उसे गांव महसूस न हो, होने चाहिए पेड़ इतने कम से कम उसे छाँव तो महसूस हो।
पूँछों अगर किसी गांव के बन्दे से , तो शहर को गन्दा बतायेगा , शहर का बन्दा गांव को गन्दा बताता है, बहुत दिनों से ये होता आया है।
समय सही है ऐसी कमियों को मिटाने का, मिलकर रहने का और एक दूसरे का दुःख दर्द और प्यार बाँटने का।
शहर में आये कोई तो, भले ही उसे गांव महसूस न हो, होने चाहिए पेड़ इतने कम से कम उसे छाँव तो महसूस हो।
पूँछों अगर किसी गांव के बन्दे से , तो शहर को गन्दा बतायेगा , शहर का बन्दा गांव को गन्दा बताता है, बहुत दिनों से ये होता आया है।
समय सही है ऐसी कमियों को मिटाने का, मिलकर रहने का और एक दूसरे का दुःख दर्द और प्यार बाँटने का।
शहर में आये कोई तो, भले ही उसे गांव महसूस न हो, होने चाहिए पेड़ इतने कम से कम उसे छाँव तो महसूस हो।
आज माहौल जुदा है, गांव तेज़ी से शहर हो रहे, गांव ,गांव न रहकर शहर हो रहे।
कुछ चीजें गांवो को शहर से जोडती है , चाहे वह सड़क हो या फिर लोगो का गांवो से शहर को आना जाना।
गांव और शहर एक सिक्के के ही है पहलू, चाहे गांव में रहूँ या शहर में रह लूँ, भले ही दोनों की परिस्तिथियां है अलग।
लाखों की भीड़ है फिर भी तन्हाई है, शहर शहर है, फिर से गाँवों की याद आयी है।
कुछ चीजें गांवो को शहर से जोडती है , चाहे वह सड़क हो या फिर लोगो का गांवो से शहर को आना जाना।
गांव और शहर एक सिक्के के ही है पहलू, चाहे गांव में रहूँ या शहर में रह लूँ, भले ही दोनों की परिस्तिथियां है अलग।
लाखों की भीड़ है फिर भी तन्हाई है, शहर शहर है, फिर से गाँवों की याद आयी है।
2 Comments
शहर का ये कड़वा सच है कि शहर में सुविधाएं तो सारी है पर हर वक्त अकेला पैन रहता है पडोसी पड़ोसी से बात नहीं करता ऐसी होती है शहर की जिंदगी !
ReplyDeleteगांव की मिटटी का अपना अलग ही ममहत्व होता है, यादें गाँव की
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