नेतागिरी: लाइट एंड डार्क


                      

यहाँ बंदर भी है बाँट भी है, साठ तक कांग्रेस रही अब भाजपा की गाँठ भी है।
यहाँ झेलना दोनों को है क्योंकि , अब क्रिकेट में बाउंसर भी दो  मान्य है।
कोई तीसरी आये तो शायद ही इनमे से एक की बाल नो हो, एक कि बत्ती गुल हो, कांग्रेस न भाजपा अबकी बारे थर्ड, फोर्थ फ्रंट हो।
यहाँ बंदर भी है बांट भी है, साठ तक कांग्रेस रही, अब भाजपा की गाँठ भी है।
दोनों ने देश को जाति में बांटा, धर्मो में बांटा और दंगो में उलझाया,
जो सुलझना भी चाहता था, इनकी चपेट में आकर सुलझ न पाया।
जैसे ही देश में चुनावों के बदल छाने लगते है, सभी राजनीतिक दलों के दूर के ढोल बजने लगते है।
एजेंडे कुछ नही इनके ये, तो सिर्फ अपने और पार्टी  के फण्ड की जुगाड़ में रहते है।
दोनों ने देश को जाति में बांटा, धर्मो में बांटा और दंगो में उलझाया।
सभी कार्यकर्ता अपने नेता  की बात  मानते है, क्योंकि वे इस मुगालते में रहते है, कि अगले चुनाव में उन्हें सांसद, विधायिकी का टिकट मिलेगा ।
जख्म कैसा भी हो, टिकट मिलते ही जख्म सिलेगा, न मिले टिकट तो पार्टी बदलने में देर नही करनी चाहिए।
न मिले कोई पार्टी तो अपनी बनाओ, ज्यादा न सही पर थोडा बहुत चंदे का जुगाड़ करो, करवाओ, जल्दी करो देर न होनी चाहिए।
पार्टी कार्यकर्ता हाय ! तुम्हारी यही कहानी, यह सच है मेहनत तुमने की पर मलाई तो है , किसी  तोंदू  नेता को है खानी।
देश में  चुनाव में वोट देने वाले मतदाता कहते है, न सहकर् भी तमाम दुखो को वे वोट- देते देते सहते है।
पड़े जरूरत तो नेता जी गधे को भी बाप, दादा कहकर पुकारते  है।
जीत जाए  चुनाव तो सबको  उल्लू बनाते है, नेताओ की यह महानता है, पांच साल में एक बार जरूर आते है, फिर से वादों की बरसात में सबको भिगोते है, न जाने ये पांच साल कौन सी गुफाओं में सोते है।


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