अस्तित्व के लिए दर दर भटकते रहना, अस्तित्व क्या है, जाने बगैर कितना कुछ कहना।
अस्तित्व क्या है खुद में तलाश कर, अस्तित्व की तलाश में खुद को संभाल चल।
अस्तित्व अपना नही, जो अपने न हो उनको अपनाने में है।
अस्तित्व कटते जंगलो, कम होते पंछियों को बचाने, बिगड़ती प्रकृति की सूरत को संवारने में है।
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अस्तित्व रोते, बिलखते उन मासूमो का जो बिन माँ के हैं, उनकी मदद करने उनके बचपन को निखारने में है।
झूठे अस्तित्व के लिए एक दूसरे से लड़ते झगड़ते रहना, गर कही अस्तित्व भी होगा, वह भी चाहता होगा हमारे बीच न रहना।
अस्तित्व प्रचार और प्रसार से नही होता है, ये नेक इरादों ,कर्मो, अच्छी सोच का विस्तार होता है।
इसके लिए लोग महल, मकान बनाते, ये अस्तित्व नही अस्तित्व की खातिर झूठी शान बनाते है।
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ये खुद होकर मिटटी के दिल पत्थर का लेके, न जाने कैसे कैसे अरमान सजाते है।
मानव की समझ नही जिन्हें, वो मानवता के रहनुमा बनके मानवता पर व्याख्यान देते है।
अस्तित्व की पहचान भी नही जिन्हें, वो दिन रात अस्तित्व की नई नई परिभाषाये गढ़ते है।
इसके लिए लोग महल, मकान बनाते, ये अस्तित्व नही अस्तित्व की खातिर झूठी शान बनाते है।
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अस्तित्व यही है मिटटी हो जाना, जिस मिटटी से जनम लिया फिर से उसी का हो जाना।
अस्तित्व हम का होता है, मैं का तो हो ही नही सकता, मैं मेरा होता है, हम सबका होता है।
अस्तित्व अपना नही अपने ईमान से होता है, चेहरे से नही हौसले की उड़ान से होता है।
अस्तित्व यही है मिटटी हो जाना, जिस मिटटी से जनम लिया फिर से उसी का हो जाना।

1 Comments
इस कविता से लोगो को बहुत अच्छी सीख मिलेगी,क्यों की आज कल लोग पैसो के चक्कर में अपना अस्तितव् ही भूल चुके है !
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