जिसकी ख़ातिर, मैं हथेलियों पे आग जलाता हूँ
वो शख्स पूछ रहा था, मैं हुनर कहाँ से लाता हूँ!
लगता है अब भी, उनके जेहन में उग आता हूँ
'तृषि', जिन्हें मैं, आवाज़ लगा के रोज़ बुलाता हूँ!
गैर के ज़ख्मों के लिये, उम्रभर बनाते रहें मरहम
तेरी तस्वीर को देखकर अपना दर्द भूल जाता हूँ
मैं दिन में कहीं भी रहूं, कहीं भी चला जाऊं मगर
शाम होते ही अपने घर की तरफ़ लौट आता हूँ!
अभी तो थोड़ा बहुत लिखता रहता हूं यूहीं तुम्हें
मिलो तो तुम्हारे बारे में, तुमको सब बताता हूँ!
तबियत करे तो घूमने आना मेरी गली में तुम भी
घर आये मेहमान को मैं ख़ुद आइना दिखाता हूँ!
✍️Trishi

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