'तृषि' हवाओं में ज़हर घोला जा रहा है
मेरे लबों से, ये क्या बोला जा रहा है?
कहीं मौत का सौदा हो रहा है खुलेआम
कहीं, मुर्दों का कफ़न खोला जा रहा है!
अब कफ़न उतारा जा रहा है
राजपथ संवारा जा रहा है
इंसान मर रहें हैं, ख़ैर बात नई नही हैं
मुश्किल ये है कि अपने अंदर की
इंसानियत को मारा जा रहा है
मेरे मुल्क़ के आकाओं को ख़बर ही नही
कि लाशों को गंगा में ढकेला जा रहा है!
इंसानियत से उठा है भरोसा मेरे शहर का
जाने वाला श्मशान भी अकेला जा रहा है!
0 Comments