प्रवासी मज़दूर (मजबूर)



दुखों में कट रहें हैं दिन, गमों की रात भारी है
लौटना है घर हमें, किसे यहां चिंता हमारी है

निकले थे रोज़ी की तलाश में, अपना ही घर छोड़कर
रोटी नसीब नहीं, किस्मत भी बैठी है मुंह मोड़कर

शहर के साए में, घर से कुछ सोच कर आए थे हम भी
मुफलिसी ने पसारे पांव और हजारों हमें मिले गम भी

घर लौटने पर हमारी सियासत की सख्त पहरेदारी है
वसूला जो किराया बताओ ये तो बताओ किस जन्म की उधारी है!

घर पहुंचेंगे कब और कैसे, ऐसे कितने ही सवाल हैं
नियम बनेंगे सरकारी ये तो गरीबों के लिए जी का जंजाल हैं

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