तू ही बता ऐ ज़िन्दगी....


                    


अंधकार के बादल छटने की आशा में
जीवन की राहों में उत्पन्न हो रही घोर निराशा में.
तू ही बता ऐ ज़िन्दगी....
समझू तुझे मै क्या, वफादारी समझूं?
साथ गुजरी जो तेरे उसे खुद्दारी समझूं?

सफ़र पर निकले हैं, मंज़िल से भी दूर हैं
कुछ इस तरह से कदम कदम पर मजबूर हैं.
तू ही बता ऐ ज़िन्दगी....
थक गया हूं, रास्ता तय करूं या क़दमों को मोड़ लूं
तू कहे तेरे संग चलूं या चलते चलते ख़ुद को छोड़ दूं.


अंधकार के बादल छटने की आशा में
जीवन की राहों में उत्पन्न हो रही घोर निराशा में.
तू ही बता ऐ ज़िन्दगी....
समझू तुझे मै क्या, वफादारी समझूं?
साथ गुजरी जो तेरे उसे खुद्दारी समझूं?


उम्रभर जलाता रहा हूं क्यों आग सीने में.
मज़ा तो खूब आया होगा तुझे भी मेरे संग जीने में.
तू ही बता ऐ ज़िन्दगी....
क्यों हर दिन तुमको एक रात हवाले करता हूं
ख्वाबों को जलाकर जज्बातों के उजाले करता हूं.


अंधकार के बादल छटने की आशा में
जीवन की राहों में उत्पन्न हो रही घोर निराशा में.
तू ही बता ऐ ज़िन्दगी....
समझू तुझे मै क्या, वफादारी समझूं?
साथ गुजरी जो तेरे उसे खुद्दारी समझूं?


जीवन की राहों में पतझड़ की बाहों
ख़ुद की निगाहों में, महकी फिज़ाओं में
तू ही बता ऐ ज़िन्दगी....
जब तू दिल बहलाती है मिश्री क्यों घुल जाती है.
चारों दिशाओं में,  इन पूरब की हवाओं में.


अंधकार के बादल छटने की आशा में
जीवन की राहों में उत्पन्न हो रही घोर निराशा में.
तू ही बता ऐ ज़िन्दगी....
समझू तुझे मै क्या, वफादारी समझूं?
साथ गुजरी जो तेरे उसे खुद्दारी समझूं?



















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