हर बरस
सरकारी महकमे छुपाते है
गरीबों की बस्तियां
लेकिन एक कपड़े की
लंबी दीवार खींचकर
कमोबेश कुछ दिनों के लिए
जिसे कुछ दिनों बाद
फिर से समेट लिया जाता है
ताकि परदे के पीछे सिसक
रही मुफलिसी सांस ले सके.
लेकिन...
वजीरे ए आजम हमारे
कोई भी काम कच्चा नहीं करते
क्योंकि उन्हें जनता ने इतिहास
बनाने के वास्ते चुना है.
वजीरे ए आजम के गृह राज्य में
झुग्गियों को ढकने के लिए
बन रही है पक्की दीवार
ये हमने भी टीवी पर देखा
और रेडियो पर सुना है.
उन्होंने कपड़े की दीवार को
ईंटों की पक्की दीवार में
तब्दील करने का राष्ट्र हित में
अभूतपूर्व निर्णय लिया है.
ताकि राष्ट्रवाद की सड़कों पर
विकास खूब तेज़ी के साथ
फर्राटा भर सके और हमको
भी अहसास हो कि हम फिर से
विश्व गुरु बनने के रास्ते पर हैं.
लेकिन हम एक चीज को भूलकर
भी नहीं याद करना चाहते हैं कि
जिस रास्ते पर शक्ति प्रदर्शन का
विकास फर्राटा भरेगा उसके बगल
में हमने एक दीवार बना दी है.
जिसके पीछे रहती है इंसानों
की आबादी जिसमें वृद्ध भी हैं
जिनका हम सम्मान करते हैं
महिलाएं भी हैं, जिनको हम
शास्त्रों में पूजते हैं और
नौनिहाल भी उसी झुग्गियों में
रहते हैं, जिन्हें देश का भविष्य
बताते हुए नेताओं की
थोड़ी सी भी सांस नहीं फूलती है.
कभी कपड़ों की दीवार से
छुपाई जाती थी मुफलिसी
आज ईंटों से ढकी जा रही है
पूरी की पूरी बस्ती और
कितना विकास करना हैं
हो गया विकास या फिर
इसको और सफर तय करना है...
6 Comments
acha h aise hi likhte rhe
ReplyDeleteबहुत उम्दा और यथार्थ पूर्ण विश्लेषण
ReplyDeleteBahut khoob
ReplyDeleteअद्भुत
ReplyDeleteBahut umda bhai
ReplyDeleteBahut accha likha h bhai. ..
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