कभी सोचा है आपने



              
पुरखों के लहू से प्यास
बुझी है इस धरती की प्यास
उनकी काल कवलित
हड्डियां ही कागज, कलम
और स्याही हैं
बेमतलब का है सीएए,
एनपीआर और एनआरसी
उनका लहू ही
उनकी नागरिकता की गवाही है.

कैसी बात कर रहे हो तुम सरकार
इक्कसवीं सदी की रहनुमाई
करते थकते नहीं!

दिखाकर सपने डिजिटल इंडिया के
तुम्हें गड़े मुर्दे उखाड़ने की तलब है
भाई तब तो हाल गज़ब है.

पुरखों के लहू से प्यास
बुझी है इस धरती की
उनकी काल कवलित
हड्डियां ही कागज, कलम
और स्याही हैं
बेमतलब का है सीएए,
एनपीआर और एनआरसी
उनका लहू ही
उनकी नागरिकता की गवाही है.










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