अंधेरों से इतने मशविरे मिल गए हैं



अंधेरों से इतने मशविरे मिल गए हैं
उजाले को हंस कर टालना पड़ता है
भले ही धूल चेहरे पर न हो मेरे यार
फिर भी आइने को संभालना पड़ता है.

ख्वाबों ने शब के अंधेरे से दोस्ती की है
उन्हें दिन का उजाला सताता बहुत है
जिंदगी कम ही हो हमने जिंदादिली जी है
ज़रा सा है सुकूं कहां मोहलत हमे मिली है.


पुरानी बातों से नया अफसाना गढ़ता हूं
तुझसे क्या उलझना खुद ही से डरता हूं
भावों से अंजान न जाने क्या पढ़ता है
पुरानी बातों से नया अफसाना गढ़ता हूं

अंधेरों से इतने मशविरे मिल गए हैं
उजाले को हंस कर टालना पड़ता है
भले ही धूल चेहरे पर न हो मेरे यार
फिर भी आइने को संभालना पड़ता है.

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