सदियों की आजादी



अमन तो खोया ही था सुकून भी अब कहीं खो गया है
तहज़ीब- ए -मुल्क के मालिक! देखो क्या हो गया है.

जिन्हें हर तरह का चैन है उन्होंने बेचैन करके रखा है
देखो!सत्तानशी बतला रहें है क्या बुरा क्या अच्छा है.

शहर की बुलंदियों का आसमां से भी ऊंचा इरादा था
बात उनके मन की न हुई बस इतना ही तो ज्यादा था.

तुम जो सड़कों पर निकल आए हो हाथ में तख्ती लिए
लोकतंत्र के ठेकेदारों को हां! बस यही तो है खल रहा.

क्यों? सोचते हो क्या हुआ है और अब है क्या चल रहा
कहीं कुछ तो है नहीं इत्ती सी बात इतना ही है खल रहा.

लाख चीखो आवाज़ें दो तो भी उनको फर्क पड़ने से रहा
अपनी मन की करने की सीखी है तुमने कुछ कहा क्या?.

सदियां जब आजादी मांगेंगी तुम मन की बात  सुना देना
खुद ही नहीं आज़ाद संकीर्ण विचारों से उससे क्या लेना देना










Post a Comment

1 Comments