कैसी ये खींचतान चल रही है



कैसी ये खींचतान चल रही है
कहीं पराली जल रही है
तो कहीं जान जल रही
कैसी ये खींचतान चल रही है।

शहर की हवाओं में ज़हर
सुबह ही शाम शाम-सा असर
जाड़े में उबल रहा शहर
सांसो में घुल रहा है ज़हर।

पराली न जलती तो प्रदूषण
पर ध्यान तक भी न जाता
धुआं निकलकर चिमनियों
से आसमान तक न जाता।

पराली जली बात सबको खली
पटाखे फूटे प्रदूषण न हुआ
ये खबर न्यूज़ चैनल्स से पता चली
पराली जली बात सबको खली।

खेतों से उड़कर पराली की दूषित हवा
शहर में धुंध बनकर है छा रही
जो लौट आयी है शहर से
थक हार कर गांव में धूनी रमा रही।

कैसी ये खींचतान चल रही है
कहीं पराली जल रही है
तो कहीं जान जल रही
कैसी ये खींचतान चल रही है।














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