क्यों दरख़्तों को भाता है शायद शज़र होना
मालूम है इन्हें भी इंसान की बदलती फ़ितरत
दरख़्तों को काटकर कंक्रीट का जाल बिछाते है
भविष्य में अंधकार होगा ये तो साक्षात जताते है
अपना नही तो थोड़ा परिंदो का ही ख़्याल करते
काटते वक्त शज़र को ज़रा खुद से सवाल करते
दरख़्तों के साये में परिंदे आसरे को घर बनाते है
उसपे बसकर उसको चहचहाता शहर बनाते है
महफूज़ रहेंगे दरख़्त थोड़ी सी संवेदना दिखाओ
इंसान हो थोड़ा प्रकृति के प्रति भी फ़र्ज़ निभाओ
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