तू! क्यों नही है सुनता क़ाग़ज़ कुछ पूछ रहा है
अरे! क़लम! तू है उदास या है कुछ सोच रहा है।
ये सोचना समझना अकेले में खुद से बाते करना
कागज़ क़लम लिए बैठ एक पल से बातें करना।
भाव मन के क़लम से बिछड़कर कागज़ो के करना
शब्द थे जो आत्मिक, सात्विक वो चिरंतन- सा झरना
कागज़ क्यों पूछें, क़लम पे एतबार क्यों न करे?
रस्ते थोड़े ही भटके है, रहबर ही भटक गए होंगे!
कागज़ के उपवन में शब्द भ्रमर रस्ता भूल गए होंगे
सानिध्य में भाषा की टहनियों से गले लग झूल गए होंगे!
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