घड़ी की बात

             
               

घर के कोने में  चुपचाप- सी एक घड़ी है पड़ी
चलते- चलते रुकी जैसे सदियों संग हो लड़ी।

घर की दीवार पर है एक घड़ी, जिसपे नज़रें भी
भूल अतीत, वर्तमान को जीने की ख़ातिर अड़ी!

निराश न होना आपसे हौसला पाती हैं ये घड़ियाँ
रिश्तों की टूटी कड़ी से कड़ियाँ मिलाती हैं घड़ियाँ!

दिन को रात से रात को दिन से मिलाती हैं घड़ियाँ
रुत कैसी भी हो हर रुत को हैँ दुलराती ये घड़ियाँ

देख तुमको ख़िलने की इज़ाज़त पाती कलियाँ
ख़ुश रहो आप को देख मुस्कुराती है ये घड़ियाँ!

घर से निकलों तो सही, रस्ते में मिलती है घड़ियाँ
मंज़िल से मिलाने के वास्ते संग चलती है घड़ियाँ!
                                                   














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