वृक्ष के बिना प्रकृति का
आँगन भी लागे सूना-सूना
होंगें न गर पेड़ पौधे व वन
कैसे बचेगा पृथ्वी का जीवन
सोचो!स्वच्छ हवा कहा से लाओगे
तुम! हवा के बिन रह पाओगे?
प्रकृति का विनाश कर
वसुधा का सार खोकर
संसाधनों का उपभोग कर
एक दिन पछताओगे तुम
जब न उगेगा एक दाना
बोलो क्या खाओगे तुम!
प्रकृति के प्रति सोचकर
कल का ख्याल रखकर
संरक्षण को स्वीकार करो
नही, तो पछताओगे तुम
सोच लो न होगा जल पृथ्वी पर
क्या सोचकर आसमाँ से
अपनी नज़रे मिलाओगे!
प्रकृति का ज़र्रा-ज़र्रा रूठा है
मानव कृत्यों से उसका दर्द फूटा है
कहीं बाढ़ का कहर तो कहीं सूखा है
हाँ! प्रकृति का ज़र्रा-ज़र्रा रूठा है!
अभी भी वक़्त है संभल जाईये!
पर्यावरण के प्रति कर्त्तव्य निभाइये
गवांकर सब सूकून नही पाओगे
जाकर क्या चाँद पर दुनिया बसाओगे?
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