परिंदे



परिंदों के पर क़तर कर वो बोले हम तुम्हें उड़ान देते है
हम ज़मीं पर रहेंगे जाओ हम तुम्हें ये आसमान देते है।

कुछ ऐसी हो गयी है सियासत हम तुम्हें ज़बान देते है
फर्ज़ भी नही निभाते वो कहते है हम वतन पे ज़ान देते है।

आसमां के परिंदों को शोहरत-ए जहाँ की शान देते है
ज़मीं के परिंदों को सिर्फ़ वादों की तेज़ ज़बान देते है।

बसर को ख्वाबों का आशियाँ रहने को गिरवी मकान देते है
परिंदों के पर क़तर कर वो बोले हम तुम्हें उड़ान देते है।

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