अभी कुछ दिनों पहले 22 मार्च को, जिनेवा-आधारित गैर-लाभकारी संगठन ने प्रमाणन और वन संरक्षण के लिए नेटवर्क फ़ॉर सर्टिफिकेशन फ़ॉर कनजर्वशन ऑफ फारेस्ट द्वारा विकसित टिकाऊ वन प्रबंधन (एसएफएम) के लिए प्रमाणन मानक का समर्थन करने का फैसला किया, जो एक भारतीय गैर-लाभकारी संगठन है।
एन सी सी ऍफ़ यानि की नेटवर्क फ़ॉर सर्टिफिकेशन फ़ॉर कनजर्वशन ऑफ फारेस्ट का गठन 2015 में किया गया था जिसका उद्देश्य यह था कि वनों के संरक्षण करते हुए वन आधारित संसाधनों का उपयोग करना जिससे वनों को भी कोई नुकसान न पहुचे और हम से वनों से प्राप्त हुए संसाधनों का दोहन न करते हुए, ऐसे उपयोग करे जिससे आने वाली पीढ़िया भी वनों से प्राप्त होने वाले संसाधनों का लाभ उठा सके।
यह भारत की पहली वन प्रमाणन नीति है जिसे वैश्विक पहचान भी मिली है।
इसी के साथ भारत भी विश्व में उन देशों की कतार में शामिल हो गया है जिनके पास विश्व स्तर पर मान्यता प्राप्त वन प्रमाणन योजना है।
भारतीय वनों को विश्व स्तर पर भागौलिक पहचान मिलना देश के लिए गर्व की बात है। आने वाले कुछ वर्षों में भारतीय वानिकी के ऊपर इस योजना का व्यापक असर भी देखने को मिल सकता है।
खासकर भारत जैसे विकासशील देश में ऐसे योजनाओ के लागू होने से जो वनों की अंधाधुंध कटाई हो रही है। उस पर नकेल कसी जा सकेगी। फर्नीचर के अवैध कारोबार पर भी अंकुश लगाया जा सकेगा।
देश का वन आधारित बाजार यूरोपीय संघ और संयुक्त राज्य अमेरिका सहित अन्य पश्चिम देशों के बाजार में अपनी पैठ बनाने की कोशिश में है क्योंकि फर्नीचर,प्लीबोर्ड, हस्तशिल्प इत्यादि का निर्यात करता है, इसलिए वन प्रमाणीकण पर जोर दिया जा रहा है।
क्योंकि जिस भी देश में भारत की लकड़ी से बने सामान का निर्यात होता है उन्होंनो स्पष्ट किया है की यदि हमें उनके यहाँ फर्नीचर का कारोबार करना है तो वन प्रमाणन सिर्टीफिकेट अनिवार्य है।
बिना इसके कारोबार की इजाजत नही दी जा सकती है।
इससे योजना से इमारती लकड़ी के कारोबार में पारदर्शिता आने के साथ ही वनों के वनों के स्थायी प्रबंधन में भी मदद मिलेगी।
इसके पहले सन 1992 में राष्ट्रीय वनीकरण एवं पारिस्थितिकी विकास बोर्ड का गठन किया गया था जो देश में वनों के रखरखाव,वृक्षारोपण, वनों के पारिस्थिकी विकास के लिए उत्तरदायी है।
जिसका प्रमुख उद्देश्य कि अभ्यारण, क्षरितवनों,राष्ट्रीय वन क्षेत्र, राष्ट्रीय उद्यान, पारिस्थितिक रूप से कमजोर क्षेत्रों पर विशेष ध्यान देना था।
देश में वनों के संरक्षण के लिए लोगो को जागरूक करना तथा आमजनों की वनों से पूरी होने वाली मांगो पर ध्यान भी देना शामिल है ।
भारतीय वन कारोबारियों की बहुत समय पहले से इस तरह की योजना की मांग कर रहे जिससे उन्हें विदेशों में अपने कारोबार को बढ़ाने में मदद मिले।
एन सी सी ऍफ़ यानि की नेटवर्क फ़ॉर सर्टिफिकेशन फ़ॉर कनजर्वशन ऑफ फारेस्ट पॉलिसी आने के बाद उनमें ख़ुशी की लहर है।
इस पॉलिसी का एक दूसरा पहलू भी है सुप्रीम कोर्ट के आदेश के अनुसार वनों में निवास कर रहे तकरीबन 10 मिलियन लोगों को निकाला जाएगा, क्योंकि वे अपनी पहचान साबित नही कर पाए।
सरकार को इस पर भी मानवीय नज़रिये से सोचने की जरूरत है क्योंकि वे भी नागरिक है, उनके भी अधिकार और कर्तव्य है।
एन सी सी ऍफ़ यानि की नेटवर्क फ़ॉर सर्टिफिकेशन फ़ॉर कनजर्वशन ऑफ फारेस्ट का गठन 2015 में किया गया था जिसका उद्देश्य यह था कि वनों के संरक्षण करते हुए वन आधारित संसाधनों का उपयोग करना जिससे वनों को भी कोई नुकसान न पहुचे और हम से वनों से प्राप्त हुए संसाधनों का दोहन न करते हुए, ऐसे उपयोग करे जिससे आने वाली पीढ़िया भी वनों से प्राप्त होने वाले संसाधनों का लाभ उठा सके।
यह भारत की पहली वन प्रमाणन नीति है जिसे वैश्विक पहचान भी मिली है।
इसी के साथ भारत भी विश्व में उन देशों की कतार में शामिल हो गया है जिनके पास विश्व स्तर पर मान्यता प्राप्त वन प्रमाणन योजना है।
भारतीय वनों को विश्व स्तर पर भागौलिक पहचान मिलना देश के लिए गर्व की बात है। आने वाले कुछ वर्षों में भारतीय वानिकी के ऊपर इस योजना का व्यापक असर भी देखने को मिल सकता है।
खासकर भारत जैसे विकासशील देश में ऐसे योजनाओ के लागू होने से जो वनों की अंधाधुंध कटाई हो रही है। उस पर नकेल कसी जा सकेगी। फर्नीचर के अवैध कारोबार पर भी अंकुश लगाया जा सकेगा।
देश का वन आधारित बाजार यूरोपीय संघ और संयुक्त राज्य अमेरिका सहित अन्य पश्चिम देशों के बाजार में अपनी पैठ बनाने की कोशिश में है क्योंकि फर्नीचर,प्लीबोर्ड, हस्तशिल्प इत्यादि का निर्यात करता है, इसलिए वन प्रमाणीकण पर जोर दिया जा रहा है।
क्योंकि जिस भी देश में भारत की लकड़ी से बने सामान का निर्यात होता है उन्होंनो स्पष्ट किया है की यदि हमें उनके यहाँ फर्नीचर का कारोबार करना है तो वन प्रमाणन सिर्टीफिकेट अनिवार्य है।
बिना इसके कारोबार की इजाजत नही दी जा सकती है।
इससे योजना से इमारती लकड़ी के कारोबार में पारदर्शिता आने के साथ ही वनों के वनों के स्थायी प्रबंधन में भी मदद मिलेगी।
इसके पहले सन 1992 में राष्ट्रीय वनीकरण एवं पारिस्थितिकी विकास बोर्ड का गठन किया गया था जो देश में वनों के रखरखाव,वृक्षारोपण, वनों के पारिस्थिकी विकास के लिए उत्तरदायी है।
जिसका प्रमुख उद्देश्य कि अभ्यारण, क्षरितवनों,राष्ट्रीय वन क्षेत्र, राष्ट्रीय उद्यान, पारिस्थितिक रूप से कमजोर क्षेत्रों पर विशेष ध्यान देना था।
देश में वनों के संरक्षण के लिए लोगो को जागरूक करना तथा आमजनों की वनों से पूरी होने वाली मांगो पर ध्यान भी देना शामिल है ।
भारतीय वन कारोबारियों की बहुत समय पहले से इस तरह की योजना की मांग कर रहे जिससे उन्हें विदेशों में अपने कारोबार को बढ़ाने में मदद मिले।
एन सी सी ऍफ़ यानि की नेटवर्क फ़ॉर सर्टिफिकेशन फ़ॉर कनजर्वशन ऑफ फारेस्ट पॉलिसी आने के बाद उनमें ख़ुशी की लहर है।
इस पॉलिसी का एक दूसरा पहलू भी है सुप्रीम कोर्ट के आदेश के अनुसार वनों में निवास कर रहे तकरीबन 10 मिलियन लोगों को निकाला जाएगा, क्योंकि वे अपनी पहचान साबित नही कर पाए।
सरकार को इस पर भी मानवीय नज़रिये से सोचने की जरूरत है क्योंकि वे भी नागरिक है, उनके भी अधिकार और कर्तव्य है।
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