असमानता की खाई
चौड़ी हो रही है
चोरी हर जगह हो रही है
कही ज्यादा- ज्यादा
कही थोड़ी-थोड़ी हो रही है
समंदर भरे है तभी तो
कुएं सूखें पड़े है
बाग़ बग़ीचे हरे है तभी तो
पेड़ सूखें खड़े है।
ये मनमौजी बादल है
अपने मिज़ाज़ से बरसते
किसी के पास रोज़ी नही
कई रोटी को हैं तरसतें
किसी का हक़ आज मर रहा है
किसी का कल मरने की
तैयारी कर रहा है।
कब से ऐसा होता आया
कब तक ये होता रहेगा
जागेगा इंसान तेरे अंदर का
या फिर यूँही सोता रहेगा
ऐसे न जाने कितने प्रश्न
उठते है हर रोज किसी न
किसी के मन में
दफ़्न कर दिए जाते है
बिना कफ़न के
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