हे! प्राणदायिनी, हे! मोक्षदायिनी
अविरल, अद्वितीय जलधारा
मां गंगा देवी तुम! समृद्धि की
आँचल का तुम्हारे सहारा.
निकलकर शिव कि जटावों से
भारतवर्ष में संचार अमृत का करके
लहलहाती फसलों को जल देकर
मानवता का कल्याण किया.
प्रकृति के गुलदानों में
हर एक फूल खिलाया मां! तुमने है
है भारत भूमि उर्वरी यह
विश्वास दिलाया तुमने है.
कर्मठता कि सीख तुम्हीं से
हम सबने यह सीखी है
बिना रुके, बिना थके
निरंतर लक्ष्य कि ओर बढ़ो.
सदियों से है गंगा
सदियों संग रहे यह गंगा
कुछ ऐसा प्रयास करें
आने वाली पीढी को भी
मां गंगा का प्यार मिले.
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