कच्ची शराब की पक्की भट्टियां
कच्ची शराब से मौत होना कोई आश्चर्य की बात नही है.
आश्चर्य तो इस बात का है, कि जैसे ही जहरीली शराब से किसी आदमी की मौत होती है,तभी हमारे लोकतंत्र के ठेकेदार व शासन और प्रशासन हरकत में आकर नाम मात्र की कार्यवाही को अंजाम देकर फ़िर से चिरकालीन निद्रा में लीन हो जाते है.
बीते दिनों उत्तर प्रदेश के सहारनपुर में 64 और उत्तराखंड के रुड़की में 24 लोगों की कच्ची शराब पीने से मौत हो गई.
हर तरफ हाहाकार है सत्ता पक्ष के लोग जवाब देने से बच रहे है तथा विपक्षी दल इस प्रकरण को मुद्दा बना रहे हैं.
इससे पहले भी प्रदेश के कई जिलों में जहरीली शराब से मौतें हुई हैं बात चाहे बाराबंकी की हो या उन्नाव या फिर लखनऊ के मलिहाबाद की करें, इन घटनाओं से यदि शासन प्रशासन ने सबक लिया होता तो शायद आज यह दिन न देखना पड़ता.
जिन लोगो की मौत हुई है सरकार उनके परिवार को चंद रुपये का मुआवजा देकर, और जाँच के नाम पर खानापूर्ति करके हमदर्दी दिखाने का प्रयास करेगी.
लेकिन सवाल यह उठता है, कि जिन परिवारों से शराब ने उनके अपनो को छीन लिया हैं, क्या सरकार द्वारा दी गयी आर्थिक मदद क्या अपनो को खोने का दर्द बाँट पाएगी?
परिवार की रोजी रोटी का जुगाड़ कैसे होगा?
ऐसे सवाल उनके परिजनों को जिंदगी भर परेशान करते रहेंगे!
कच्ची शराब के इस मौत के खेल को तत्काल खत्म करने की जरूरत है.
नही तो! कच्ची शराब की भट्टियां फ़िर से धधकने लगेंगी जिसका परिणाम हम आप और सबको पता है.
चाहे रामराज हो या कोई भी राज बिना सत्ता और प्रशासन के संरंक्षण के किसी भी अवैध कार्य को इतने बड़े पैमाने पर नही किया जा सकता है, अर्थात सीधे शब्दों में कहे तो शराब माफियाओं को पुलिस का समर्थन प्राप्त होता हैं.
सबसे पहले इन्हे सुधारना होगा, जब तक ये नही सुधरेंगे तब तक कोई भी जतन कर लो कुछ कल्याण नहीं होने वाला है!
कच्ची शराब से मौत होना कोई आश्चर्य की बात नही है.
आश्चर्य तो इस बात का है, कि जैसे ही जहरीली शराब से किसी आदमी की मौत होती है,तभी हमारे लोकतंत्र के ठेकेदार व शासन और प्रशासन हरकत में आकर नाम मात्र की कार्यवाही को अंजाम देकर फ़िर से चिरकालीन निद्रा में लीन हो जाते है.
बीते दिनों उत्तर प्रदेश के सहारनपुर में 64 और उत्तराखंड के रुड़की में 24 लोगों की कच्ची शराब पीने से मौत हो गई.
हर तरफ हाहाकार है सत्ता पक्ष के लोग जवाब देने से बच रहे है तथा विपक्षी दल इस प्रकरण को मुद्दा बना रहे हैं.
इससे पहले भी प्रदेश के कई जिलों में जहरीली शराब से मौतें हुई हैं बात चाहे बाराबंकी की हो या उन्नाव या फिर लखनऊ के मलिहाबाद की करें, इन घटनाओं से यदि शासन प्रशासन ने सबक लिया होता तो शायद आज यह दिन न देखना पड़ता.
जिन लोगो की मौत हुई है सरकार उनके परिवार को चंद रुपये का मुआवजा देकर, और जाँच के नाम पर खानापूर्ति करके हमदर्दी दिखाने का प्रयास करेगी.
लेकिन सवाल यह उठता है, कि जिन परिवारों से शराब ने उनके अपनो को छीन लिया हैं, क्या सरकार द्वारा दी गयी आर्थिक मदद क्या अपनो को खोने का दर्द बाँट पाएगी?
परिवार की रोजी रोटी का जुगाड़ कैसे होगा?
ऐसे सवाल उनके परिजनों को जिंदगी भर परेशान करते रहेंगे!
कच्ची शराब के इस मौत के खेल को तत्काल खत्म करने की जरूरत है.
नही तो! कच्ची शराब की भट्टियां फ़िर से धधकने लगेंगी जिसका परिणाम हम आप और सबको पता है.
चाहे रामराज हो या कोई भी राज बिना सत्ता और प्रशासन के संरंक्षण के किसी भी अवैध कार्य को इतने बड़े पैमाने पर नही किया जा सकता है, अर्थात सीधे शब्दों में कहे तो शराब माफियाओं को पुलिस का समर्थन प्राप्त होता हैं.
सबसे पहले इन्हे सुधारना होगा, जब तक ये नही सुधरेंगे तब तक कोई भी जतन कर लो कुछ कल्याण नहीं होने वाला है!
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