स्याह समंदर है, रखना सफ़र जारी,
गुजर गए सब ,
अब अपनी है बारी .
चलों करते हैं पार, परखते हैं,
अपनी क्या है तैयारी .
हर तरफ, हर जगह,
स्याह(अंधकार) की,
स्याही(कालिख) फैली है.
जो दिखती सफेदी सबके दामन पर,
वो अबूझ पहेली है.
बातें होतीं हैं, सदभाव, समानता की,
बस बातों में ही बात दबा दी जाती.
गर मौका मिले किसी को,
बिन चिंगारी के ही आग लगा जाए,
अपना क्या दूसरे का भी हक खा जाये.
यही है आज का रामराज,
सब को सिद्ध करने हैं अपने काज.
सदियों से,प्रजा 'बेचारी'है,
राजा क्या रानी की भी,
देखो कैसी लाचारी है?
ये तो रामराज की तैयारी.
रामराज कैसा होगा,
यह नेता जी बतलायेंगे,
रामराज में राम जी होंगे,
या होगा कोई और,
इस पर भी कोई आध्यादेश लाएंगे,
यह भी नेता जी बतलायेंगे.

0 Comments