कितना कुछ कहती ये जिंदंगी!


कितना कुछ कहती ये ज़िन्दगी, डर के साए उल्फ़तो की बाजुओं में रहती ये जिंदंगी!

दिल माने या न माने, हमको  कुछ न कुछ समझाए रहती ये ज़िन्दगी!
बिन लफ्ज़ो, इशारों के  सहारे, अनकहे पहलुओं को बयां करती ज़िन्दगी!
जो हो भी न सामने उनकी बात कहती ज़िन्दगी ,डर के साए उल्फतो के बाजुओं में रहती ये जिंदंगी!
प्रकृति की गोद में हवा,  साँस और पानी बनकर रहती ये जिंदंगी!
संसार रूपी समंदर में लहर् बनकर, गिरती उठती रहती ये ज़िन्दगी!
कभी धरनी बनकर,  सबको अपने अंक में समेटती ये ज़िदगी।
वेदों की ऋचाओं , मन की आंकांछाओ, हिमालय की शिखाओं से कुछ कहती ये ज़िदगी।
किसी को  पाकर न खोना चाहती ये जिंदंगी,डर के साए उल्फ़तो की  बाजुओं में रहती ये जिंदंगी!
 मन सोना चाहता है,  न सोने देती ये ज़िन्दगी मुझे नही पता क्या चाहती ये जिंदंगी?
मैं चाहता नही जाना  जहां, वहाँ ले जाती ज़िन्दगी मुझे नही पता क्या चाहती ये जिंदंगी?
तीन कांटे ज़िदगी के , ज़िन्दगी से मांगे जिंदंगी!
मेरी, तुम्हारी , हमारी  ज़िन्दगी, सूने नयनों से कैसे निहारे ज़िन्दगी।
मैं तुझसे पूंछू क्यों तड़पाये ज़िन्दगी, मुझे नही पता क्या चाहे ज़िन्दगी?
ये सुहानी सी रूहानी ज़िन्दगी, क्या चाहे क्या बतलाये ज़िन्दगी, शीशे का समंदर बनाये ज़िंदगी!
कितना कुछ कहती ये ज़िन्दगी, डर के साए उल्फ़तो की बाजुओं में रहती ये जिंदंगी!

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