रामराज्य के बीमारू अस्पताल


जैसा कि नाम से ही विदित है की दोनों की कार्य प्रणालियों में भी ज्यादा अंतर नहीं दिखता है। जिनके बारे में कहा जाता है यदि किसी राज्य में शासन-प्रशासन ना हो तो यह दर्शित होता है, कि उस राज्य में लोकतंत्र है ही नहीं और हो भी नहीं सकता है।  शासन में बैठे लोगों को जनता स्वयं निर्वाचित करती है।
जबकि प्रशासन में उपस्थित लोग को अपनी मेहनत पढ़ाई के बूते प्रदेश के प्रशासनिक व्यवस्था में स्थान पाते हैं।
 प्रशासन शब्द जिसका सीधा सा अर्थ है, लोगों की देखभाल करना होता है।
 कुछेक को छोड़ दिया जाए तो ज्यादातर  प्रशासनिक अफसरों की नकेल शासन में बैठे जनसेवकों के हाथों में होती है।
 जो जनसाधारण अर्थात सबसे निचले तबके या किसी भी आम आदमी के अधिकारों को हड़पने सरकारी धन की बंदरबांट करने की जुगत में नित्य लीन रहते हैं।
 वह भी बिना किसी परवाह के, वह एक पल भी को नहीं समझते की वे क्या कर रहे हैं।
 उससे किसी का भी चाहे कितना बड़ा नुकसान क्यों ना हो जाए नुकसान का मतलब यह कि चाहे किसी की जान भी चली जाए!
 नेता और अधिकारी के लिए के लिए यह बहुत छोटी सी घटना होती है, क्योंकि यह नकारे, भ्रष्ट और न जाने इनके कितने रूप होते हैं।
 इन्हे बस अपनी बीवी बच्चों की खुशियों से वास्ता होता है।
 यह बीमारों गरीबों लाचारों असहायों को के दर्द दर्द वो क्या जाने जो मुश्किल से 2 जून की रोटी का जुगाड़ करते हैं।
 कभी कोई बीमार पड़े तो उसे सरकारी अस्पताल में ले जाने से सभी लोग घबराते हैं, क्योंकि  वहां की व्यवस्था और अवस्था बाई- चांस भगवान देख ले तो,अपने दिल पर पत्थर रखकर सभी नेताओं अधिकारियों की परिक्रमा करके अपने को धन्य मानेगें!
 वह भी सोचने को मजबूर होंगे कि हमने तो इंसान बना कर भेजा इन्हें, इनको किसने भ्रष्ट और निकम्मा बनाया भगवान के लिए यह यक्ष प्रश्न है।
 आपकी मरने के बाद यदि स्वर्ग जाने की इच्छा हो तो आप बेशक जाइए।
 हमें तो यह भी नहीं पता स्वर्ग है या नहीं भी।
 हां इतना जरूर  है कि,  हमेशा के लिए  नही  बस यूँही यदि आपका मन  नर्क को देखने का हो तो आप बस एक बार फुर्सत से या गैर फुर्सत से यूपी के अस्पतालों में  हो आइये ।  समझो की आप ने नर्क के  दर्शन पा लिए ।
फिर आपको स्वर्ग नर्क के चक्कर में नही पड़ना पड़ेगा।
बातबीते दिन की है।
  प्रदेश की राजधानी लखनऊ के निकट जिला बाराबंकी सीएचसी अस्पताल में प्रसव कराने आई महिला को सांप ने डस लिया और महिला समेत उसके गर्भ में पल रहे 9 महीने के शिशु की मौत हो गई।
 इंतहा तो तब हो गई जब परिजनों द्वारा अस्पताल में मौजूद सीएचसी के डॉक्टर और कर्मचारियोँ को महिला के सर्पदंश की सूचना दी गई , और वे अपने कमरे में सोते  रहे।
 मौत का दर्द क्या होता है? यदि आपको जानना है तो सिर्फ उस महिला के परिजन ही आप को मौत की पीड़ा और अपनों को खोने का गम समझा पाएंगे!
 न कि वहां पर ड्यूटी पर तैनात डॉक्टर क्योंकि जिस महिला की की मौत हुई वह किसी डॉक्टर या किसी नेता की सगी नहीं थी।
जिंदंगी में सेटिंग या अपने सिर पर किसी नेता का साया होना बहुत जरूरी है , नही तो ऐसे ही कीमत चुकानी पड़ेगी आम आदमी होने की।
 मैं इतना लिख पाया क्योंकि मुझे अखबार के जरिए जानकारी मिली।
लगभग दो वर्ष पूर्व मुझे वहां जाने का मौका मिला था ।
तब मुझे वहां पर् सांप तो नही दिखा पर् अस्पताल परिसर में गन्दगी का अंबार , बड़ी घास , मच्छरों का का हुजूम रातो में अस्पताल में लाइट न जलना सी. एच. सी. त्रिवेदीगंज बाराबंकी की खासियत है ।
बाराबंकी तो महज नमूना भर है ।
सूबे में न जाने कितने सी. एच .सी., पी.एच. सी. भिन्न- भिन्न तरह की अव्यवस्था से लैस है।
और अंत में  ईश्वर से यही प्रार्थना है कि वह सभी जिम्मेदारो को सद्बुद्धि दे जिससे कि, भविष्य में कोई ऐसी घटना कम से कम अस्पतालों में न घटित हो!


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