रुख़ तुम्हारी अदा का






रुख़ तुम्हारी हर एक अदा ने ऐसे मोड़ा है

झील सी आंखों ने जी भरकर निचोड़ा है!


पहले पत्थर साबित किया गया था हमको

अब हमें ठोकर मारकर शीशे सा तोड़ा है!


दुआओं में जिन्हें शामिल किया था अपनी

उसी ने मंज़िल के सफर में रस्ते पे छोड़ा हैं


हम नहीं हैं, बिल्कुल भी उनकी तलाश में

मैं नही, फ़िर कौन उनकी राह का रोड़ा है


नस-नस में शामिल था हमारी और उनकी

अब बहुत नही शायद ही, बहुत थोड़ा है!

                                     ✍️Trishi





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