कभी बैठो रेल की पटरियों पर
तो तुम्हें सच्चाई पता चलेगी!
कि इस विपदा की घड़ी में
कितने प्रवासी घर पहुंचे हैं
कितने अपनी बारी आने का
कई दिनों से इंतज़ार कर रहें है
ये तुम्हें कोई नही बताएगा
जब तुम अपने हाथों से
सहलाओगे रेल की पटरियां
तो तुम्हें ख़ुद ब ख़ुद
पता चल जाएगा!
क्योंकि इन पटरियों का
और प्रवासियों का एक रिश्ता है
जिसे हम खून के रिश्तें
का नाम दे सकते हैं!
तुम्हें ही क्या हम सबको याद है
कि पिछले लॉकडाउन में इन्हीं
पटरियों पर सोलह जानें बेसुध
होकर सो गईं थी! और उनके
पास वे रोटियां भी थी
जिनके लिए वे अपना घरबार
छोड़कर परदेश में आते हैं!
लेकिन अफ़सोस जब वे
परदेश से जा रहे थे अपने घर
उन रोटियों को लेकर!
उसी समय आसामयिक नींद
ने उन्हें अपने आगोश में लेकर
उनको अपने गंतव्य तक पहुंचने
से पहले ही रोक लिया!
तभी से लेकर आज तक
प्रवासियों और रेल की
पटरियों के बीच न टूटने
वाला एक संबंध स्थापित
हो गया है।
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