बेपरवाह बाशिंदे

 


हम तो  आज़ाद खयालों के बंदे है
आसमां के साए में, उड़ते हुए परिंदे हैं!

अब घर बनाने को फ़ुरसत ही कहां है?
हम चलते फिरते बेपरवाह बाशिंदे हैं!

फितरत कहां मिलती है, अपनी इंसान से?
परों को छोड, हौसले की उड़ानों के परिंदे हैं.

दरख़्त की डाली पर बैठे, धूप में छांव के तले
सुकून में गुजारे दो पल, फिर वहां से हम चले!

कभी यहां कभी वहां और हम कहां कहां चले?
फर्क क्या पड़ता, किन हालातों में हम कहां पले?

मिलता दाना पानी पर किसी से कुछ हम कहे नहीं
आज़ाद ख़याली हस्ती थी,पिंजरे में हम रहे नहीं.













































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