खुद से कहना : आसान न होगा!



यादों के सफ़र में हमें, मीलों अभी है चलना
बेशक तू मेरा चांद है, मुझे सूरज सा है ढलना!
तुम्हारे कंधों पे भी बोझ, तुमको भी है संभलना
जब मंज़िल तलाश लूंगा, होगा फिर से मिलना!

तुम से दूर तुम्हारी रानाई को, लिखता रहूंगा 
तुम को देखूं तो आइने में, खुद दिखता रहूंगा
चारों तरफ मैं अपने एक दीवार बनाता रहूंगा
अपने इर्द गिर्द तुमको को मैं ऐसे पाता रहूंगा


तुम फिर से दोस्ती की भाषा में मौन हो जाना
नज़रें मिलें या हम, आहें भरकर मौन हो जाना
तुम ठहरोगी!, सोचोगी अभी घर भी है जाना
घर जाकर कहोगी खुद से! होगा कोई अनजाना.



हम लौटेंगे जब बाज़ार से फिर बेजार हो जाएंगे
दिल में थे ही नहीं काहे गम, कहां से निकाले जाएंगे
ख़बर मिलने की होगी, पुराने अख़बार हो जाएंगे
पत्थरों को ठोकर न मारना, मौके पर ये उछाले जाएंगे.

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