लोग कहते हैं, दिन पुराने अब लौट रहें हैं
घर बनाने वाले, अपने घरों को लौट रहें हैं
लगता है कि चलते हुए, ज़माने बीत रहें हैं
शहर गए थे कमाने, भूखे प्यासे लौट रहें हैं
ज़माने में रहनुमाओं के अहसास ज़ुदा हैं
होंगे खुदा बहुत, मजदूरों का कौन खुदा है?
तड़प, बेबसी और ये इनके पांवों के छाले
ज़रा देखो! इनके घर भी हो राहत के उजाले
जिनके हाथों में हैं शहरभर की जिम्मेदारियां
कोई उनसे ही कहे, कोई तो रास्ता निकालें!

7 Comments
Bahut khub dost ....
ReplyDeleteबहुत आभार मित्र
DeleteSahi likha bhai
ReplyDeleteधन्यवाद
ReplyDeleteSahi kaha beta
ReplyDeleteधन्यवाद
DeleteNice line
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