आख़िर कब तक...



हर हाथ कातिल, हाथों में खंजर दिखाई देता है
आंखों में दहशतगर्दी का ऐसा मंज़र दिखाई देता है.

मिलते थे जहां पर गले एक दूसरे से इंसान बनकर
गिरी लाशें जले, जले मकां वीरान मंज़र दिखाई देता है.

गली, कूचे, मोहल्ले से चीख पुकार सुनाई देती है
बिछड़ने की आहट, उजड़ी दुनिया दिखाई देती है.

सियासतदां के पैगाम पर कब तक टकराते रहेंगे हम?
मज़हब के नाम पर खुद का खून बहाते रहेंगे हम!

कब तक चलेगा सिलसिला, ये थमता क्यों नहीं?
अमन की धरा पर गैर मज़हबी सूरज उगता क्यों नहीं

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