लिख चुका हूं तुम्हें बहुत
अब मैं एकदम खाली हूँ
हां जब सब बेरोज़गार है!
इस शायद वाले सब में हूँ.
कारण भी है कि कोई हुनर
नही है मुझमें इसलिए मैं भी
पूरा का पूरा खाली हूँ अब.
जब किसी सफ़र में होता हूँ
तो कुछ नही करता सिर्फ़
सोचता हूँ कि कोई बंदिश भी
नही है, न कोई बहाना है,
कि कुछ करूं भी या सिर्फ़
अकेले में बैठकर खुद को
ढूंढू बाद उसके कोई भी
बहाना न बचेगा कही पर
काम की तलाश में भटककर
कोई भी काम कर लूंगा, लेकिन
फिर क्या खुद से मुलाकात हो
पायेगी! क्या हूँ, मुझे इसका उत्तर
मिल पायेगा, बिंध जाऊंगा
जिम्मेदारियों की जंजीरों से!
क्या अल्फ़ाज़ ऐसी अवस्था
में साँस ले पाएंगे मुझमें!
इस ऊहापोह में क्या खुदको
बदल पाना आसान होगा.
तुम भी चाहती होगी कि मैं
ये सब छोड़कर कुछ पैसे
कमाऊं जिससे कि गुज़ारा
तो ढंग से करूं!
शायद तुम देश की वर्तमान
हक़ीक़त से परिचित नही
तभी तो तुम्हें मेरी चिंता है
की मैं कुछ तो करूँ।
देश में धर्म के नाम पर अपनी
राजनीतिक रोटियां सेंकने
की ख़ातिर राजनीतिक दल
युवाओं को बरगला रहे है
जिससे वे रोज़गार न माँगे
सिर्फ उनके इशारे पर कठपुतलियों
कि तरह काम करते रहें!
और जानती हो तुम! गर कोई रोज़गार
या इंसाफ की बात करे या फ़िर हुक्मरानों
से गलती से भी कोई सवाल कर भी दे
तो उसे देशद्रोही भी ठहरा दिया जाता है.
इस दौर में क़ुछ अच्छा कर सकूं
कुछ लिख सकूँ जिससे आने वाली
जेनरेशन के कानों में हिन्दू मुस्लिम-
हिन्दू-मुस्लिम न गूँजने पाए
और क़ामयाबी हासिल हो.
नही तो ये ज़हर उनमें भी घोल दिया जायेगा
इसी तरह ये सब चलता रहेगा..
इसलिए तुमसे लिखने की इजाज़त
चाहता हूँ सब कुछ भूलकर!
0 Comments