आत्मसम्मान की खोज में भटकता इंसान!


      






आज के इस अति व्यस्तता भरे दौर में  आदमी को दूसरे के लिए क्या?  जब अपने लिए ही फुरसत नही है, तो ऐसे में वह सिर्फ और सिर्फ पैसे कमाने के लिए दिन रात मेहनत करता रहता है, पैसे कमाने के लिये दिन रात मेहनत करे भी न तो क्या करे? आज का समय अति आधुनिकता वादी है, एक व्यक्ति की दूसरे व्यक्ति से  आगे निकलने की प्रतियोगिता हो अच्छी बात है । पर ध्यान रहे कि इस प्रकार से आगे बढ़े की किसी अगले को आपकी वजह से नुकसान न उठाना पड़े।
नित्य अपने कर्मो में लीन इंसान को धन के अलावा भी कुछ चीजों की चिंता सताया करती है। मान लीजिए की इंसान चाहे अच्छा कार्य करे या बुरा उसे अपने आत्मसम्मान की चिंता हमेशा सताती रहती है।
कैसे भी वह यही सोचता रहता है, कि वो कोई ऐसा काम न करे जिससे कि खुद के आत्मसम्मान को ठेस न पहुचे, लेकिन जाने अनजाने पता नही कितनी दफा वह दूसरों के आत्मसम्मान को हानि पहुचाया करते है।
समाज मे नाम कमाने के चक्कर मे गलत संगत में पड़कर गलत कार्यो को अंजाम देते हैं।
आज का समय ही ऐसा है की व्यक्ति अपनी शान बढाने, किसी के आगे न झुकने की उसकी प्रवृति ने ही व्यक्ति के जीवन मे विष घोल दिया है, क्योंकि आत्मसम्मान की खोज में दर दर भटकते इंसान को यह कतई नही आभाष होता है कि आत्मसम्मान अपनी शेखी बघारने, विलासितापूर्ण जीवन जीने को अपना आत्मसम्मान कतई नही कहा जा सकता है।
आत्मसंम्मान तो खोजने से कतई नही मिलता बल्कि यह निःस्वार्थ भाव से की गई मानवता की सेवा, समाज के प्रति अपने  कर्त्तव्यों के निर्वहन,सत्य का अनुकरण करने से, हृदय में,दया, करुणा  स्नेह भाव होने मात्रा से ही आत्मसम्मान कि अनुभूति होती है, इसके लिए कही भी भटकने की जरूरत नही है।

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