राष्ट्र की राजनीतिक परिस्थिति





यदि हम राष्ट्र की राजनीतिक परिस्थिति की आज के सन्दर्भ में  बात करे तो यह कहना अनुचित न होगा की जो राजनीतिक परिस्थिति आज से लगभग दस साल पहले की थी वे अब पूर्णतया बदल चुकी हैं।  राजनीति के मायने बदल चुके है, और राजनेताओं की प्राथमिकताएं जनसेवा न होकर सिर्फ अपने व् पार्टी के लिए सिर्फ और सिर्फ धन अर्जित करना व किसी भी तरह साम दाम दंड भेद का प्रयोग करके सत्ता और लाइमलाइट में बने रहना चाहते है।
देश के  प्रमुख दो दल भाजपा और कांग्रेस जिनमे से कांग्रेस ने देश पर लगभग साठ वर्षो तक लंबा शासन किया, तथा वर्तमान में भारतीय जनता पार्टी की सरकार है।
2014 के आम चुनाव में भाजपा ने काफी अच्छा प्रदर्शन करते हुए भाजपा ने अपने सहयोगी दलों के साथ मिलकर पूर्ण बहुमत की सरकार बनाई, तथा कांग्रेस मात्र 44 सीटों पर सिमट गयी थी। जब भी देश में आम चुनाव या उत्तर प्रदेश जैसे बड़े राज्यो के चुनाव नजदीक होते है । राम मंदिर , गौरक्षा,हिन्दू, मुस्लिम जैसे मामले को उछाला जाने लगता है, ऐसे मुद्दे जो की चुनाव होने के बाद ठन्डे बसते में डाल दिए जाते है।
देश की वर्तमान राजनितिक परिस्तिथि ऐसी है कि भाजपा जो की सत्ता में है वो तो राम नाम के सहारे है, कांग्रेस भी सॉफ्ट हिंदुत्व का कार्ड खेलकर अपनी सत्ता वापसी की जुगत में है। लेकिन हाल में  ही घोषित हुई पांच राज्यो की चुनाव की तारीखों ने कांग्रेस का सिरदर्द बढ़ा दिया है क्योंकि इन राज्यो में सपा और बसपा ने विधानसभा चुनाव में कांग्रेस के साथ मिलकर चुनाव लड़ने की बात को सिरे से खारिज कर दिया है।
                              भाषाई गिरावट
राष्ट्रीय राजनीति में आजकल ऐसे शब्दों का प्रयोग हो रहा है।
जिससे न केवल राजनीटी का स्तर गिर चुका है।
बीते दिनों एक कार्यक्रम में केंद्रीय मंत्री अश्विनी चौबे ने कांग्रेस पार्टी के अध्यक्ष राहुल ग़ांधी को नाली का कीड़ा का दिया।
सन 2016 में पकिस्तान पर की सर्जिकल स्ट्राइक का प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने भाषण में बखान क्या कर दिया, राहुल गांधी ने मोदी को जवानों की खून की दलाली करने वाला तक कह दिया।
देश की राजनीति में कुछ वर्षों से लगातार कुछ न कुछ बदलाव देखने को मिल रहे है।

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