दीया जलाने वाले हाथों में छाले पड़ गयें हैं
अंधेरी बस्तियों की कैद में उजाले पड़ गयें हैं!
कहीं किसी भूखें बच्चे के ख़्वाब में आई रोटी
कहीं रसोई से डस्टबिन में निवाले पड़ गयें हैं!
बांटने की बात घर की घर पर ही हो रही थी
दीवारों को देख सोच में घरवाले पड़ गए हैं!
बगीचे को फ़ूल की आस में पानी दे रहें हैं सभी
पानी बिना, जंगल के हरे पेड़ काले पड़ गयें हैं!
✍️ Trishi

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