घरेलू कामगार(श्रमिक) किसी परिचय के मोहताज नही



   यह सच है कि आज हम सभी लोग (तथाकथित बुद्धिजीवी लोग)  यह कहकर प्रसन्न हो जाते हैं, क़ि आज का समाज  21वी सदी का समाज है। यह कहते हुए नही थकते क़ि, यहाँ पर किसी भी प्रकार का भेदभाव नही है, लोग शिक्षित हो रहे है और समाज बदल रहा है।  एवं देश विकसित हो रहा है। तथा ज्यादातर लोग  अपने आप को सभ्य होंने का तमगा स्वयं ही को दे रहे है। लेकिन यह बात भी पूर्णतया सत्य है कि यदि कोई चीज नहीं बदली है तो वह है, हमारे आपके घरों में काम करने वाली घरेलू कामगार(श्रमिको) की स्थिति जिनमें ज्यादातर महिलाएं एवं नाबालिक लड़के, लड़कियां होती हैं। पारिवारिक जरूरतों आर्थिक तंगी इत्यादि, इत्यादि आवश्यकताओ की पूर्ति लिए अपना श्रम बेचती है। अर्थात सीधे शब्दो में कहे तो लोगों के घरों में काम करके जैसे झाड़ू-पोंछा, बर्तन और  कपड़े धो कर खाना जैसे  आदि अनेक काम करके मेहनताना धन (अर्जित करना) होता है। जिससे वह अपने परिवार का पालन पोषण करती हैं । इन कामगारों में अधिकतर महिलाओं में ज्यादातर उन परिवारों से होती होती हैं,जिनमें उनके पति की मृत्यु हो गई होती है, या वह अपंग या फिर नशेड़ी होता है जिस कारण महिला कामगारों को लोगों के घर काम करके परिवार चलाने की जिम्मेदारी का बोझ उठाना पड़ता है, तथा ज्यादातर कामगार परिवार सहित शहर किनारे झुग्गी - झोपड़ियों में जीवन व्यतीत करती हैं, यहां पर जनकवि गजानन माधव मुक्तिबोध कुछ पंक्तियां दृष्टव्य हैंः
गंदी बस्तियों के पास नाले पर
,बरगद हैं
फुदकते हैं, वही दो चार
बिखरे बाल वाली बाल बालकों के श्याम गंदे तन
वह लोहे की बनी स्त्री पुरुष आकृतियां
दलित दर की भयानक देवता से भव्य चेहरे के चमकते धूल में.
जिन घरों में यह कामगार महिलाएं झाड़ू पोछा चौका बर्तन कपड़ा धोना खाना बनाने सहित ढेर सारे काम करती हैं, उन घरों के मालिकों द्वारा काम के अनुपात में बहुत ही कम  मजदूरी दी जाती है।
जो आज के परिपेक्ष में बिल्कुल भी अनुकूल नहीं है, यदि उन कामगारों द्वारा काम के बदले काम के बराबर पारिश्रमिक की मांग की जाती है या फिर पैसे बढ़ाने का अनुरोध किया जाता है तो उनको डरा धमकाकर चुप रहने की हिदायत दी जाती है और साथ में काम से हटाने के भी धमकी दी जाती है। साथ ही काम से हटाने की भी धमकी दी जाती है।  इसके अलावा इनके प्रति जाति, धर्म, छुआछूत  आर्थिक असमानता  सरीखे इत्यादि कारणों से हिंसा और दुर्व्यवहार भी किया जाता है। क्योंकि यह महिला कामगार समाज में तथाकथित ठेकेदारों द्वारा निर्मित जाति व्यवस्था में अधिकतर कामगार जाति व्यवस्था की पद सोपानिक श्रेणी में अधिकतर महिला कामगार  निचले श्रेणी  में होती हैं। जिस कारण यह जिन घरों में काम करने जाती हैं जिनमें से ज्यादातर घरों में इन्हें जाति, छुआछूत इत्यादि तरीकों का दंश झेलना पड़ता है।
समाज में व्याप्त इस प्रकार के आडंबर को धिक्कारते हुए सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन आगे की यह पत्ती की पंक्तियां निम्नलिखित हैं:-
सुनो तुम्हें ललकार रहा हूं सुनो घृणा का गान!
तुम जो भाई को अछूत कह वस्त्र बचाकर भागे,
तुम जो बहिने छोड बिलखती, बढे जा रहे आगे
सुनो तुम्हें ललकार रहा हूं सुनो घृणा का गान।

इन सब बातों के अलावा घरों में महिलाओं को जो काम करना पड़ता है, जैसे इंधन इकट्ठा करना दूर दराज  से  से पानी लाना परिवार के व्यवसाय में या खेती-बाड़ी में मदद करना यह काम किसी गिनती में नहीं आता, क्योंकि इसके लिए उन्हें कुछ नहीं मिलता है।  1981 की जनगणना के अनुसार महिला कार्यकर्ताओं के 89.5 प्रतिशत को असंगठित क्षेत्र में काम करना पड़ता था ।
असंगठित होने का सबसे बड़ा कारण यह है, ये कामगार लोगो के घरों में काम करने तो जाती है तब भी इनको यह कहकर श्रमिक मानने से इसलिये इंकार कर दिया जाता है,  क्योकि लोगो द्वार इनको पारिश्रमिक घंटो के हिसाब से मिलता है तथा सरकार के बनाये नियम के अनुसार जो व्यक्ति आठ घंटे से कम काम करता है सरकार उसको मजदूर नही मानती है ।
इसी कारण इनकी संख्या कितनी है यह भी डाटा  भी सरकार के पास नही होता है । कुछ संगठन इनकी बेहतरी के लिए काम कर रहे है ,जिनकी प्रमुख मांगे है जैसे इनको श्रमिक का दर्जा दिया जाय, इनकी जनगणना कराकर इनकी  वर्तमान संख्या कुल कितनी है ।
और इनकी सामाजिक सुरक्षा का भी ध्यान रखा जाना चाहिए । इनको  पहचान पत्र मुहैया कराया जाना चाहिए जिससे  इनको इनके काम के द्वारा पहचान जा सके।
और तमाम सरकारी सुविधाओं का लाभ मिल सके ।
इनकी सामाजिक सुरक्षा इत्यादि का ध्यान भी रखा जाना चाहिए, सामाजिक सुरक्षा से तात्पर्य  विशिष्ट अर्थों में सामाजिक सुरक्षा उन लोगों को जो  वृद्धायु,पंगुता, बेरोजगारी परिवार के मुखिया की मृत्यु अथवा नियंत्रण से बाहर परिस्थितियों के कारण आय के साधन खो देते हैं। की सरकार  द्वारा सुरक्षा की ओर इंगित करती है।
जिससे इनके जीवन को बेहतर बनाया जा सके। इस दिशा कुछ संगठन पहले से कार्य कर रहे है तथा समाज के नागरिकों को भी  घरेलू कामगारो  के प्रति अपने कर्तव्यों का निर्वहन बिना किसी भेदभाव के करना चाहिए।


                                                                                   














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3 Comments

  1. आपने समाज में फैला छुआ छूत जो एक कैंसर के समान है, जो एक सराहनीय काम है इस के धन्यवाद,

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  2. aaj samaj ko inhe samajik kuritiyon se bachana hai kyonki ye desh rupi tree m dimak ke samaan h ....

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