डीपी बदलना तो मेरे बस में है मेरे दोस्त!
मगर उसके आईने से दिल मे मेरा चेहरा नही है
उसकी गली से गुजरूँ तो झिझक जाता हूँ
मैं उसके ख़्वाब में आऊं, जहाँ पहरा नही है
प्यास छुपाता रहा इस कदर ज़माने से मगर मैं
ईमान उसकी नज़रो की सिवा कहीं ठहरा नही है
ज़ख्म दिखाता फिरूँ मैं सबको, ए मेरे दोस्त!
ज़ख्म ही तो है, रिश्ते की जड़ों से गहरा नही है

2 Comments
बहुत दर्द भारी कहानी है भाई आपकी
ReplyDeleteदिल का दर्द बाहर निकल रहा है
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