
आजादी के लगभग 70 सालो के बाद भी आर्थिक असमानता कम न होकर लगातार बढती जा रही है। जिसके लिए सरकारों द्वारा बनाई नीतिया जिनको नीतिया न कहकर जन विरोधी नीतिया कहे तो ज्यादा बेहतर होगा इन नीतियों का ही परिणाम है की जो व्यक्ति अमीर है वह और अमीर हो रहा है।
वर्तमान समय की तुलना में आजादी के तीन दशको तक आर्थिक असमानता कम थी इनिक्वालिती रिपोर्ट 2018 वाईडनिंग गैप्स के मुताबिक आय उपभोग और धन मानको पर भारत असमान स्थित वाले देशो में है, तथा इन परिस्थितियों के लिए सरकार की नीतियों को जिम्मेंदार ठहराया गया है ।
बीतें महीने जनवरी में दावोस में विश्व आर्थिक मंच की बैठक से पहले आक्सफेम इंडिया ने एक और रिपोर्ट जारी की जिसके हवाले से कहा गया कि, भारत में 2017 में कुल सम्पति के सर्जन का 73 प्रतिशत हिस्सा उन लोगो के पास है जिनकी संख्या देश की जनसँख्या का एक प्रतिशत है। देश में आज अरब पतियो की संख्या बढ़कर 101 हो गई है. पिछले साल 17 नए लोग अरब पतियों के पूल में शामिल हुए कुल मिलाकर 101 अरब पति जिनकी संपत्ति घरेलु सकल उत्पाद (जी ० डी० पी ) के 15 प्रतिशत के बराबर है। रिपोर्ट के अनुसार 5 साल पहले जो जी डी पी का 10 प्रतिशत था और आज बढ़कर 15 प्रतिशत हो गया है।
देश में आर्थिक असमानता की चौड़ी होती खाई यह दर्शाती है, कि सरकारे चाहे किसी भी दल की रही हो. उनकी जन विरोधी आर्थिक नीतियों के कारण हमेशा से देश बेरोजगारी , गरीबी तथा अन्य सामाजिक बुराइयों के चगुल में फसता जा रहा है। देश की हनसंख्या आज भी गरीबी रेखा से नीचे जीवन यापन कर रही है।
2004- 05 के आंकणो के अनुसार विगत वर्षो के दौरान गरीबी 37.2 प्रतिशत से घटकर 29.8 प्रतिशत हुई है ,
तथा योजना आयोग के अनुसार यदि शहर में रहने वाला आदमी 28.65 और गाँव में निवास करने वाला आदमी 22.42 रूपए खर्च करता है , तो ऐसे लोगा को गरीब नहीं कहा जा सकता है ।
इन सब बातो से एक बात तो निश्चित तौर पर तय होती है , कि यह देश सचमुच विषमताओ, विविधताओं तथा विडम्बनाओ का देश है , कयोंकि देश सरकर चलाती है , तथा सरकार में काफी धनवान , उधोगपति तथा पूंजीवाद के घोर समरथक बैठे हैं। जिससे केवल उधोगपतिओ का jyada से jyada फायदा हो सके । जिसके dwara वह सत्ता क उपभोग करते हुये अपनी महत्वकांक्षाओ को पूरा कर सके। तथा गरीब, मजदूर, किसान इतयादि आम आदमी का शोषण कर सके । भ्रष्टाचार के कारण भी आर्थिक असामनता पनप रही है । आम लोगो को उनका हक मिलने से पहले ही बिचोलियेे ही उनका हक मार लेते है ।
जिससे गरीब और बदहाल जिन्दगी जीने को मजबूर हो रहा है। आर्थिक असमानता कल्याणकारी राज्य का बड़ा ही चिंताजनक कारण है। समाज में व्याप्त विभिन्न प्रकार की बुराइयों के लिये कहीं न कहीं आर्थिक असमानता का बहुत बड़ा योगदान होता है । जिससे समाज में किसी न किसी प्रकार का संघर्ष चलता रहता है। कवि रामधारी सिंह दिनकर की मर्मस्पर्शी पंक्तियां इसका सटीक उदहारण हैं:-
शांति नहीं तब तक , जब तक / सुख़ भाग न नर का सम हो
नहीं किसी को बहुत अधिक हो / नहीं किसी को कम हो .
वर्तमान समय की तुलना में आजादी के तीन दशको तक आर्थिक असमानता कम थी इनिक्वालिती रिपोर्ट 2018 वाईडनिंग गैप्स के मुताबिक आय उपभोग और धन मानको पर भारत असमान स्थित वाले देशो में है, तथा इन परिस्थितियों के लिए सरकार की नीतियों को जिम्मेंदार ठहराया गया है ।
बीतें महीने जनवरी में दावोस में विश्व आर्थिक मंच की बैठक से पहले आक्सफेम इंडिया ने एक और रिपोर्ट जारी की जिसके हवाले से कहा गया कि, भारत में 2017 में कुल सम्पति के सर्जन का 73 प्रतिशत हिस्सा उन लोगो के पास है जिनकी संख्या देश की जनसँख्या का एक प्रतिशत है। देश में आज अरब पतियो की संख्या बढ़कर 101 हो गई है. पिछले साल 17 नए लोग अरब पतियों के पूल में शामिल हुए कुल मिलाकर 101 अरब पति जिनकी संपत्ति घरेलु सकल उत्पाद (जी ० डी० पी ) के 15 प्रतिशत के बराबर है। रिपोर्ट के अनुसार 5 साल पहले जो जी डी पी का 10 प्रतिशत था और आज बढ़कर 15 प्रतिशत हो गया है।
देश में आर्थिक असमानता की चौड़ी होती खाई यह दर्शाती है, कि सरकारे चाहे किसी भी दल की रही हो. उनकी जन विरोधी आर्थिक नीतियों के कारण हमेशा से देश बेरोजगारी , गरीबी तथा अन्य सामाजिक बुराइयों के चगुल में फसता जा रहा है। देश की हनसंख्या आज भी गरीबी रेखा से नीचे जीवन यापन कर रही है।
2004- 05 के आंकणो के अनुसार विगत वर्षो के दौरान गरीबी 37.2 प्रतिशत से घटकर 29.8 प्रतिशत हुई है ,
तथा योजना आयोग के अनुसार यदि शहर में रहने वाला आदमी 28.65 और गाँव में निवास करने वाला आदमी 22.42 रूपए खर्च करता है , तो ऐसे लोगा को गरीब नहीं कहा जा सकता है ।
इन सब बातो से एक बात तो निश्चित तौर पर तय होती है , कि यह देश सचमुच विषमताओ, विविधताओं तथा विडम्बनाओ का देश है , कयोंकि देश सरकर चलाती है , तथा सरकार में काफी धनवान , उधोगपति तथा पूंजीवाद के घोर समरथक बैठे हैं। जिससे केवल उधोगपतिओ का jyada से jyada फायदा हो सके । जिसके dwara वह सत्ता क उपभोग करते हुये अपनी महत्वकांक्षाओ को पूरा कर सके। तथा गरीब, मजदूर, किसान इतयादि आम आदमी का शोषण कर सके । भ्रष्टाचार के कारण भी आर्थिक असामनता पनप रही है । आम लोगो को उनका हक मिलने से पहले ही बिचोलियेे ही उनका हक मार लेते है ।
जिससे गरीब और बदहाल जिन्दगी जीने को मजबूर हो रहा है। आर्थिक असमानता कल्याणकारी राज्य का बड़ा ही चिंताजनक कारण है। समाज में व्याप्त विभिन्न प्रकार की बुराइयों के लिये कहीं न कहीं आर्थिक असमानता का बहुत बड़ा योगदान होता है । जिससे समाज में किसी न किसी प्रकार का संघर्ष चलता रहता है। कवि रामधारी सिंह दिनकर की मर्मस्पर्शी पंक्तियां इसका सटीक उदहारण हैं:-
शांति नहीं तब तक , जब तक / सुख़ भाग न नर का सम हो
नहीं किसी को बहुत अधिक हो / नहीं किसी को कम हो .
अर्थात कहने का तात्पर्य यह है कि, सरकार और प्रशासन को ऐसी नीतियाँ बनानी चाहिए, जिससे आर्थिक असमानता कम हो तथा अंतिम छोर यानी की समाज के सबसे पायदान पर खड़े व्यक्ति को आर्थिक संकट से उबारा जा सके, जिससे देश सच्चे मायनों में विकास के पथ पर आगे बढ़ सके।
4 Comments
आप ने इस लेख के जरीये सारकार तथा पराशासन को सुझाव दिया है की भारत की अर्थिक असमानता को किसी नीति दवारा कम किया जाये, अत: आप का ये सुझाव सराहनीय हैं ! 🌹धन्य वाद! 🌹
ReplyDeleteSarkare aati hai jati h lakin samaaj m bhin bhin prakar ki asmaantao ko samapt nhi kr pati h iska main vajah jamini estar par kam na karna ..
ReplyDeleteSamvidhan me jo hak inko mile h vo prapt he nhi hote .
Aapki likhit lineo m sacchai h
Nice ....
आर्थिक असमानता ये सरकारों के कारन ही पनपती रहती हैं, सरकारो को इस मुद्दे पर ध्यान देने की जरूरत है
ReplyDeleteआर्थिक असमानता ये सरकारों के कारन ही पनपती रहती हैं, सरकारो को इस मुद्दे पर ध्यान देने की जरूरत है
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