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पानी नही था, हलक सूखा था
ज़ोर से रोने वाला बच्चा भूखा था.
अपने दर्द को अपनों में बाँट रहे थे
रहगुज़र थे, चौराहे पर रात काट रहे थे.
ईक आवाज़ सुनी थी हमने भी
बच्चों को मज़दूर पिता डांट रहे थे.
ईक तिरपाल बिछाकर सब लेट रहे थे
रोटी की भूख थी, चाँद को देख रहे थे.
जो छोटी चादर थी उनके हिस्से में
उसको नंगे बदन पर लपेट रहे थे.
सोचने वाली बात है अगर
सोचों, वो रहगुज़र क्या सोच रहे थे.

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